जवाहरलाल नेहरु उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान केन्द्र
 
 

 
   
भूगतिकी एकक

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भूगतिकी एकक
 

ऐसी पट्टियों का पता लगाना - जहाँ अचानक एवं त्वरित रूप से होनेवाली भौमिकी परिघटनाएँ अक्सर, जीवन के प्राकृतिक संरूपण को आस्थिर बना देती हैं तथा परिसर व्यवस्था (पारिस्थितिकी) के संतुलन को भयवाह बना देती है - यही तो उस एक सदस्यीय एकक का प्रमुख उद्देश्य तथा कार्यकलापों का मुख्य आकर्षण रहे हैं । हिमालय वृत्तांश के केन्द्रीय भाग (उत्तरांचल में कुमाऊँ), आग्नेय कर्नाटक में बिळिगिरि रंगन क्षेत्र तथा पश्चिम कर्नाटक में सह्याद्रि क्षेत्र तथा केरल में बारंबार होनेवाले भूस्खलन अभिमुखी तथा भूकंपों की घटनाओंको अध्ययन के लिये अपना लिया गया है । अध्ययन क्षेत्रों की प्राकृतिक प्रणालियों में होनेवाले भौतिक परिवर्तनों के विभिन्न संकेतों का निर्वचन (की व्याख्या) स्थलाकृतिय नक्शों तथा उपग्रह प्रतिबिंबों में प्रतिमानों के विश्लेषण द्वारा, साथ ही गहन व विस्तृत क्षेत्र कार्य नदियों, झरियों के असामान्य व्यवहारों के निर्वचन को निरंतर विवर्तनीय चालनों की प्रतिक्रिया में तथा सामान्य जोखिम सूचकों के दृश्यमान वीक्षणों द्वारा किया गया है ।

पिछले दशक में क्षेत्राधारित अध्ययनों ने यह प्रदर्शित किया है कि भू-रूपों का भूआकारिकीय पुनरुज्जीवन, नदियों की दिशाओं में परिवर्तन, उनके अनियमित करवेदार मोड़ तथा उनके अवरोध से सरोवरों के निर्माण के रूप में आविर्भाव, तथा परवर्ती रूप में काली मिट्टी के संचय के सपाट भूमि का विकास, नाली के क्षरण की वृद्दि के कारण भू-रूप का रूपांतरण तथा आग्नेय कर्नाटक तथा निकटवर्ती तमिल नाडु, दक्षिणी सह्याद्रि तथा केन्द्रीय केरल की तराइयों की पट्टियों में तथा उत्तरांचल हिमालय के पूर्वी कुमाऊँ में सोरघाटी में सक्रिय दोषों के आर-पार पर्वतों/पहाड़ियों के घेरों में विकास - ये सभी प्राचीन दोषों पर निरंतरता से जारी चालनों के कारण होते हैं । अब तो यह अनुभव किया गया है कि पुराने दोषों के वर्तमान समय में पुनर्सक्रियन से इन भूकंप सुलभ पट्टियों के भू-पृष्ठों में तनाव के श्लथन के प्रति (अपना योगदान मिल रहा है) बढ़ावा हो रहा है । अध्ययन का एक और क्षेत्र रहा है - उच्च हिमालय में प्रादेशिक भूभागीय निर्धारक सीमा दोश के चित्रण इन में हाल ही के संवेग के तंत्रात्मकता में अंतर्दृष्टि प्राप्त करना रहा है तथा इनमें होनेवाले परिवर्तनों की सूचनो प्राप्त करना रहा है ।



 
2012, जवाहरलाल नेहरु उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान केन्द्र. Supported by W4RI